ليست نمايشهاي پذيرفته شده در مرحله بازخواني متن در اولين جشنواره منطقه اي تئاتر مرصاد
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رديف |
نام نمايش |
كارگردان |
نويسنده |
شهرستان |
استان |
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1- |
مرده ايم همين دورو ورا |
شاهو رستمي |
شاهو رستمي |
سنندج |
كردستان |
|
2- |
پاييز هزار و سيصد و جنگ |
سعيد نوروزي |
مصطفي كوشكي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
3- |
صبح غريب |
اردشير منوچهري |
مهدي پور رضائيان |
پاوه |
" |
|
4- |
مسيحا |
علي حشمتي |
سجاد افشاريان |
سنقر كليايي |
" |
|
5- |
عروس |
جمال برفي |
حسن حاجت پور |
" " |
" |
|
6- |
خرگوش سفيد با چشمهاي قرمز |
رحمان هوشياري |
رضا گشتاسب |
كرمانشاه |
" |
|
7- |
چه كسي جنگ را آغاز كرد |
شهرام الماسي |
امين ابراهيمي |
" |
" |
|
8- |
باد كه مي نويسد |
مهدي حبيبي |
آرش عباسي |
ملاير |
همدان |
|
9- |
والمري |
اكبر مرادي كامياب |
علي نرگس نژاد |
همدان |
همدان |
|
10- |
رحمت |
پژمان شاهوردي |
پژمان شاهوردي |
بروجرد |
لرستان |
|
11- |
شاخه گل رعنا |
نرگس مردي |
علي زيستي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
12- |
باد كه مي نويسد |
سحر شهبازي |
آرش عباسي |
اسلام آباد غرب |
كرمانشاه |
|
13- |
چه كسي جنگ را آغاز كرد |
جعفر در دانه |
امين ابراهيمي |
كنگاور |
" |
|
14- |
خون و لجن |
امين ابراهيمي |
" " |
كوهدشت |
استان لرستان |
|
15- |
مردي با چشمان آبي |
نعمت اله اسدي مرام |
خسرو اميري |
هرسين |
كرمانشاه |
|
16- |
به آسمان نگاه كن |
دانيال حيدري |
سيد محمد خاتمي |
اسلام آباد غرب |
كرمانشاه |
|
17- |
موج ما را خواهد برد |
آرش منصوري |
آرش منصوري |
" " |
" |
|
18- |
دو متر در دو متر جنگ |
حسين نادري |
حميد رضا آذرنگ |
كرمانشاه |
" |
|
19- |
مهماني در مخچه |
بيژن رضايي |
خسرو اميري |
" |
" |
|
20- |
آخرين معبر |
زينب رضواني |
محمد زارع زاده |
سقز |
كردستان |
|
21- |
لودر چي |
حيدر رضايي |
محمد عسگري |
دهلران |
ايلام |
|
22- |
بازگشت |
پيام كاظمي |
هومن روح تافي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
23- |
از چرخ تا چرخ |
زينب اميري |
عبدالرضا روضه اي |
" |
" |
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24- |
سپيده دم |
صادق كياني مقدم |
صادق كياني مقدم |
ايوانغرب |
ايلام |
|
25 |
سمفوني روي گدازه هاي آتشفشان تلخ |
سعيد جمشيدي |
ميلاد اكبر نژاد |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
26- |
قطعات گم شده ، ضايعات جنگي |
سارا مرادي |
محمد حسين ناصر بخت |
" |
" |
توضيحات :
1- نمايشهاي فوق در بين 71 نمايش رسيده به دبيرخانه جشنواره براساس اولويتهاي ذكر شده در فراخوان پذيرفته شده اند.
2- انجام مرحله بازبيني صحنه اي از 25/4/89 به بعد ميباشد جدول بازبيني متعاقبا اعلام مي گردد.
3- كارگردانهاي نمايش فوق جهت هماهنگي بازبيني با شماره هاي دبيرخانه تماس حاصل نمايند.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------- دبيرخانه اولين جشنواره منطقه اي تئاتر مرصاد . اسلام آباد غرب 12 الي 15 مرداد ماه 89
تلفن : 08325224155 فاكس 08325222250 همراه : 09187263161 - 09189328195 WWW.THEATR.MERSAD.BLAGFA.CO
اسامي نمايشنامه هاي شركت كننده در اولين جشنواره منطقه اي تئاتر مرصاد مرداد ماه 89
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رديف |
نام نمايش |
نام كارگردان |
نام نويسنده |
شهرستان |
استان |
گروه نمايش |
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1 |
مرده ايم همين دور و ورا |
شاهو رستمي |
شاهو رستمي |
سنندج |
كردستان |
تئاتر تجربه جوان |
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2 |
پاييز هزار و سيصد و جنگ |
سعيد نوروزي |
مصطفي كوشكي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
كلهر |
|
3 |
اتوبان سكوت |
" " " |
شهرام كرمي |
" " " |
" " |
" |
|
4 |
صبح غريب |
اردشير منوچهري |
مهدي پور رضا ئيان |
پاوه |
" " |
شنه ي هورامان |
|
5 |
به دنبال زندگي .... زندگي شايد ....1 |
مهدي يوسفي |
جلال اشرف روزبه |
گيلانغرب |
كرمانشاه |
|
|
6 |
مسيحا |
علي حشمتي |
سجاد افشاريان |
سنقر كليايي |
" |
شيدا |
|
7 |
عروس |
جمال برفي |
حسن حاجت پور |
" " |
" |
" |
|
8 |
يك قدم تا مرد |
رامين رسول زاده |
فرشاد منظوفي نيا |
خرم آباد |
لرستان |
ايماگران صحنه |
|
9 |
شور دلتنگي گلوله |
روح اله صالحي |
روح اله صالحي |
نهاوند |
همدان |
هناسه |
|
10 |
خرگوش سفيد با چشم هاي قرمز |
رحمان هوشياري |
رضا گشتاسب |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
11 |
چه كسي جنگ را آغاز كرد |
شهرام الماسي |
امين ابراهيمي |
" |
" |
|
|
12 |
باد كه مي نويسد |
مهدي حبيبي |
آرش عباسي |
ملاير |
همدان |
سپيد و سياه |
|
13 |
دهاني پر از كلاغ |
نرگس خاك كار |
جمشيد خانيان |
ملاير |
" |
" " |
|
14 |
والمري |
اكبر مرادي كامياب |
علي نرگس نژاد |
همدان |
" |
مادستان |
|
15 |
بازمانده |
حميد اصغري |
سجاد طهماسبي |
تويسركان |
همدان |
تنها |
|
16 |
باورهاي هنوز داشتن |
وحيد قلخانباز |
" " |
" |
" |
قاب خالي |
|
17 |
فقط ده دقيقه |
هادي يگانه |
حميد رضا نعيمي |
بروجرد |
لرستان |
|
|
18 |
ابو غريب تا غربت |
ايوب سلطانيان |
عليرضا حنيفي |
سنقر كليايي |
كرمانشاه |
|
|
19 |
رحمت |
پژمان شاهوردي |
پژمان شاهوردي |
بروجرد |
لرستان |
|
|
20 |
شاخه گل رعنا |
نرگس مردي |
علي زيستي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
21 |
نقطه صفر |
علي زيستي |
" " |
" |
" |
|
|
22 |
شب هندوانه |
سعيد ذبيحي |
" " |
" |
" |
|
|
23
|
صورت خونين شيرين |
فاطمه مهدي آبادي |
فاطمه مهدي آبادي |
" |
" |
|
|
24 |
امان از آن لحظه |
سعيد ذبيحي |
سعيد ذبيحي |
" |
" |
|
|
25
|
نمايشي براي دانشگاه |
علي حسن نوري |
آرش منصوري |
اسلام آباد غرب |
كرمانشاه |
|
|
26 |
امير ارسلان بازمانده جنگي |
سيامك رعنايي |
سيامك رعنايي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
27 |
باد كه مي نويسد |
سحر شهبازي |
آرش عباسي |
اسلام اباد غرب |
" |
|
|
28 |
تالاب
|
سحر شهبازي |
نسيم سليمان پور |
اسلام آباد غرب |
كرمانشاه |
|
|
29 |
چه كسي جنگ را آغاز كرد |
جعفر دردانه |
امين ابراهيمي |
كنگاور |
كرمانشاه |
|
|
30 |
خون و لجن |
امين ابراهيمي |
امين ابراهيمي |
كوهدشت |
استان لرستان |
|
|
31 |
بامن مثل دريا |
محسن يار محمدي |
محمد جواد كاسه ساز |
هرسين |
كرمانشاه |
|
|
32 |
من زراره عذر طاها هستم |
" " |
ميلاد آبز نژاد |
" |
" |
|
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33 |
مردي با چشمان آبي |
نعمت اله اسدي مرام |
خسرو اميري |
" |
" |
|
|
34 |
تانگوي كوچك در آسمان |
امين احمدي كاكا وندي |
" " |
" |
" |
|
|
35 |
جغد قرمز |
مرتضي اسدي مرام |
نعمت اله اسدي مرام |
" |
" |
|
|
36 |
اينك وصال |
كامران دلريش |
دانيال حيدري |
اسلام آباد غرب |
" |
|
|
37 |
به آسمان نگاه كن |
دانيال حيدري |
سيد محمد خاتمي |
" " |
" |
|
|
38 |
بهشت به شرط آتش |
بهزاد حيدري |
آرش منصوري |
" " |
" |
|
|
39 |
موج ما را خواهد برد |
آرش منصوري |
" " |
" " |
" |
|
|
40 |
دو متر در دو متر جنگ |
حسين نادري |
حميد رضا آذرنگ |
كرمانشاه |
" |
پت و مت |
|
41 |
قطار جنوب |
كيانوش بهروز پور |
عليرضا حنيفي |
همدان |
همدان |
|
|
42 |
پوتين هاي پايدار |
مهرداد رستم آبادي |
علي حاتمي نژاد |
كرمانشاه |
صحنه |
|
|
43 |
مهماني در مخچه |
بيژن رضايي |
خسرو اميري |
" |
كرمانشاه |
|
|
44 |
بهانه اي براي ترانه هاي ناسروده |
امير زارع زاده |
امير زارع زاده |
سقز |
كردستان |
|
|
45 |
آخرين معبر |
زينب رضواني |
محمد زارع زاده |
" |
" |
|
|
46 |
صبح صادق |
سحر مقصودي |
سيد حسين و حميد رضا شريعتمداري |
بروجرد |
لرستان |
انتظار |
|
47 |
نمايش هاي گمگشته |
صادق كياني مقدم |
صادق كياني مقدم |
ايوانغرب |
ايلام |
|
|
48 |
آئينه هاي مكدر |
سعيد خير الهي |
سعيد خير الهي |
دهلران |
ايلام |
|
|
49 |
انتظار با بوي نرگس |
مهرداد رستم آبادي |
زينب صالح پور |
كنگاور |
كرمانشاه |
حافظ |
|
50 |
لودر چي |
حيدر رضايي |
محمد عسگري |
دهلران |
ايلام |
|
|
51 |
تبر |
علي حياتي |
علي حياتي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
52 |
محكوميت |
پويا بازرگان |
پويا بازرگان |
" |
" |
|
|
53 |
گفته بودم چوبيايي |
رضا روان |
حسين صفي |
همدان |
همدان |
چهره نما |
|
54 |
قطعات گمشده |
سارا مرادي |
محمد حسين ناصر بخت |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
55 |
ملتي در تبعيد ابدي |
هومن روح تافي |
هومن روح تافي |
" |
" |
|
|
56 |
روي زمين آهسته گام بردار |
پريا اميري |
پريا اميري |
" |
" |
|
|
57 |
بانو |
پيام كاظمي |
هومن روح تافي |
" |
" |
|
|
58 |
بازگشت |
پيام كاظمي |
هومن روح تافي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
59 |
حزب ا... هفت حرف است |
زينب اميري |
رضا حسينيان |
" |
" |
|
|
60 |
از چرخ تا چرخ |
زينب اميري |
عبدالرضا روضه اي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
61 |
خواب ، تلخ ، عشق |
نعيم گودرزي |
پريا اميري |
" |
" |
|
|
62 |
تفنگ هاي كهنه |
هومن روح تافي |
هومن روح تافي |
" |
" |
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|
63 |
نخل و كوسه |
مراد عزتي |
ناصح كامكاري |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
|
|
64 |
سپيده دم |
صادق كياني مقدم |
صادق كياني مقدم |
ايوانغرب |
ايلام |
|
|
65 |
آژير قرمز |
عزت بانو ناصري |
مهدي پاك |
اسلام آباد غرب |
كرمانشاه |
مشكات |
|
66 |
جاجيم |
كاوه فتاحي |
كاوه فتاحي |
روانسر |
كرمانشاه |
شولان |
|
67 |
كما |
مسلم صالحي |
علي مرادجاني |
الشتر |
لرستان |
پژواك |
|
68 |
آخرين پرواز يك كبوتر |
صياد خاليگران |
محمد برزويي |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
وصال |
|
69 |
شاخه ها بي ريشه مي خشكند |
احمد صد في |
احمد صد في |
" |
" |
|
|
70 |
سبز هاي خاكي |
الهه كمالي |
اصغر فكوري |
ايلام |
ايلام |
|
|
71 |
سمفوني روي گدازه هاي آتشفشان تلخ |
سعيد جمشيدي |
ميلاد اكبر نژاد |
كرمانشاه |
كرمانشاه |
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1 - بخش مسابقه نمایشنامه نویسی:
یکی از ارکان مهم نمایش که به عنوان اصلیترین عامل شکلگیری این هنر شناخته میشود نمایشنامه است. ستاد برگزاری جشنواره به منظور توجه به تولید متون نمایشی مناسب با مضامین و محور بانوان و با هدف معرفی توانمندی بانوان هنرمند در طول تاریخ و جامعه معاصر این مسابقه را در دو بخش برگزار میکند.
الف – نمایشنامههای با موضوع و شخصیتهای تاریخی بانوان ایران و جهان اسلام
ب – نمایشنامههای با محوریت زنان جامعه معاصر
الف: نمایشنامه نویسی با موضوع، شخصیتهای تاریخی :
زندگی شخصیتهای برجسته زنان در طول تاریخ ایران و جهان میتواند الگوی بسیار مناسبی برای بهتر زیستن و رشد و ترقی افراد جامعه کنونی به خصوص جوانان باشد. در این قسمت علاوه بر نمایشنامه نویسان ایرانی هنرمندان سایر کشورهای جهان اسلام امکان شرکت در مسابقه را خواهند داشت. موضوع آثار شرکتکننده در این بخش باید در مورد زندگی و و شخصیت زنان تاثیرگذار و یا چهرههای شناخته شده تاریخ ایران و جهان اسلام در عرصههای مختلف تاریخی ، مذهبی ، فرهنگی ، علمی و هنری باشد.
جوایز مسابقه نمایشنامهنویسی با موضوع شخصیتهای تاریخی:
1- نمایشنامه برگزیده اول - تندیس مسابقه و دیپلم افتخار و مبلغ 50/000/000 ریال
2- نمایشنامه برگزیده دوم - دیپلم افتخار و مبلغ 30/000/000 ریال
3- نمایشنامه برگزیده سوم - دیپلم افتخار و مبلغ 20/000/000 ریال
ب: نمایشنامه نویسی با محوریت شخصیتهای معاصر:
با وجود تخریب چهره واقعی و کم ارزش نمودن شخصیت زن در برخی از جوامع، بانوان ایران و جهان اسلام توانستهاند با اتکاء به توان فکری و عملی همتراز با مردان نقش اساسی خود را در حفظ کرامت و اندیشه بشری به خوبی ایفا کنند. این بخش با هدف پرداختن به نقش سازنده بانوان در جامعه معاصر در سطح هنرمندان ایران و سایر کشورهای جهان برگزار میشود. موضوع آثار شرکتکننده بر محور شخصیت و تاثیر زنان در جامعه کنونی بایـستی با مــضامین «زن در خانواده، زن در جامعه، زن در دفاع مقدس و انقلاب اسلامی، زنان سرپرست خانواده ، زنان نخبه جامعه و نقش زن در فرهنگ شهروندی» باشد.
جوایز مسابقه نمایشنامه نویسی با محوریت شخصیتهای معاصر:
1- نمایشنامه برگزیده اول - تندیس مسابقه و دیپلم افتخار و مبلغ 50/000/000 ریال
2- نمایشنامه برگزیده دوم - دیپلم افتخار و مبلغ 30/000/000 ریال
3- نمایشنامه برگزیده سوم - دیپلم افتخار و مبلغ 20/000/000 ریال
شرایط:
1- نمایشنامههای ارسالی نباید تاکنون اجرای عمومی رفته و یا در مسابقه و جشنوارههای دیگری شرکت کرده باشد. آثار برگزیده در اولویت شرکت در جشنواره سراسری تئاتر بانوان است.
2- محدودیتی برای ارسال چند اثر از یک نویسنده وجود ندارد.
3- متقاضیان شرکت در جشنواره بایستی سه نسخه از نمایشنامه را به همراه cd در محیطword را به دبیرخانه جشنواره ارسال کنند.
4- حداکثر مهلت ارسال نمایشنامه تا تاریخ 1/7/1389 خواهد بود. مراسم معرفی نویسندگان و نمایشنامه های برگزیده در آبان ماه خواهد بود.
5- شرکت کنندگان سایر کشورها باید نمایشنامه خود را به یکی از دو زبان عربی و یا انگلیسی ارائه کنند. ( آثار ترجمه شده با تقاضای کتبی نویسنده امکان شرکت در جشنواره را خواهد داشت. )
6- نمایشنامههای منتخب در یک کتاب چاپ خواهد شد و جایزه تعلق گرفته به اثر برگزیده به عنوان حق چاپ اثر برای یک بار چاپ توسط ستاد جشنواره خواهد بود.
7- علاوه بر اهدای سه جایزه اصلی مسابقه در هر یک از بخشها در صورت تشخیص هیئت انتخاب حداکثر ده اثر با اهدا جوایز شامل سکه بهار آزادی و لوح سپاس، مورد تقدیر قرار خواهند گرفت. همچنین هیچ جایزهای به صورت هم ارزش تقسیم نخواهد شد و با ارزیابی هر تعداد از آثار دریافتی جایزه پیش بینی شده به نفرات برتر تعلق خواهد گرفت.
2 - بخش پژوهش:
در دنیای معاصر با وجود تخریب چهره واقعی و کم ارزش نمودن شخصیت زن در برخی از جوامع، بانوان با اتکاء به توان فکری و عملی، نقش اساسی خود را در حفظ کرامت و اندیشه بشری ایفا کردهاند. بخش مسابقه مقالات پژوهشی با چهار موضوع «بررسی شخصیت زنان بزرگ تاریخ و جنبههای نمایشی آن – بررسی شخصیت زن در نمایشنامههای ایران و جهان – بررسی شخصیت های تاریخی زنان مسلمان در نمایشنامه – تئاتر بانوان و نقش آن در جامعه و فرهنگ شهری » برگزار میشود.
شرایط:
1- رعایت اصول تحقیق و پژوهش در مقالات ارائه شده ضروری می باشد. لازم است چکیده مقاله و موضوع به همراه اصل مقاله ارائه شود.
2- مقالات پژوهشی نباید تاکنون در هیچ مسابقه و یا همایش ارائه شده و یا چاپ شده باشد.
3- محدودیتی برای ارائه تعداد مقاله وجود ندارد. مقالات دریافت شده عودت داده نمیشود.
4- متقاضیان میتوانند سه نسخه از مقاله تایپ شده خود را به همراه cd در محیط word به دبیرخانه جشنواره ارائه کنند.
5- مقالات برگزیده در یک مجموعه چاپ خواهد شد و جایزه اختصاص یافته به عنوان حقالتالیف چاپ اثر برای یک بار توسط ستاد جشنواره تلقی خواهد شد.
6- امکان ارائه مقاله از طرف نویسندگان سایر کشورهای مسلمان وجود دارد. مقالات میتواند به زبان عربی و یا انگلیسی باشد.
7- علاوه بر اهدا سه جایزه اصلی مسابقه در صورت تشخیص هیئت علمی حداکثر ده مقاله با اهدا جوایز شامل سکه بهار آزادی و لوح سپاس مورد تقدیر قرار خواهند گرفت.
جوایز:
1- مقاله پژوهشی اول - تندیس مسابقه و دیپلم افتخار و مبلغ 30/000/000 ریال
2- مقاله پژوهشی دوم - دیپلم افتخار و مبلغ 20/000/000 ریال
3- مقاله پژوهشی سوم - دیپلم افتخار و مبلغ 10/000/000 ریال
تقاضانامه شرکت در مسابقه نمایشنامه نویسی و مقالات پژوهشی
اینجانب با پذیرش کلیه شروط مندرج در این فراخوان بدینوسیله متن خود را جهت شرکت در بخش:
الف) مسابقه نمایشنامه نویسی شامل: شخصیت های تاریخی شخصیت های معاصر
ب) پژوهش ارائه می نمایم.
توضیحاتی درباره اثر ارائه شده:
نشانی دقیق محل سکونت:
کدپستی:
تلفن نویسنده:
تاریخ و امضاء
به نقل از ایران تئاتر
سال تجلیل از شکسپیر این پرسش با دو چندان اهمیت مطرح می شود که:
آثار او را چگونه باید به صحنه برد؟
یا اینکه: آیا درام های او همین هائی هستند که ما در تئاترهایمان برایشان هزینه می کنیم؟
به این سؤال یقیناً تنها به یاری علم نمی توان پاسخ داد؛ خانم کوزیما واگنر فقط به این دلیل از دعوت آدولف آیپا و ادوارد گوردن کریک به بایرویت خودداری کرد که «استاد هنوز هم خود به اجرای پارسیفال اشتغال دارد». ناگفته نگذاریم که این اپرا تا دهه بیست در همانجا اجراء می گردید و خانم کوزیما فراموش کرده بود البته تماشاگران را با سال 1882 هماهنگ سازد. حال اگر این نظریه را بپذیریم که یک اثر تئاتری را فقط در شب اجرا و توسط انسان های زنده برای انسان های زنده به نمایش درمی آورند، باید تمامی جنبه های زنده آن را هم بپذیریم و به عصر اجرائی و تجسم صحنه ای آنهم اهمیت قائل شویم. تاریخ تئاتر به ما می آموزد که درام های شکسپیر پس از مرگ او و ممنوعیت تئاتر 26 سال بعد از فوت شکسپیر توسط پیوریتان ها هرگز آن طور به اجرا درنیامد که خود وی به معرض تماشا می گذاشت یا اجازه می داد به اجرا درآورند.
هر دورانی روح و سلیقه خودش را بر آثار او تحمیل کرده است. عصر روشنگری و «روکوکو» تراژدیها را با «هپی اند» زینت داد؛ دوران «اشتورم و درانگ» و «رمانتیک» باورهای خود را در قالب تصاویر طبیعی و نبوغ آمیز ارائه کردند؛ رئالیزم و ناتورالیزم نوعی شکوه تزئینی – تاریخی را تکامل بخشیدند که امپرسیونیزم هم به نوبه خود آن را دیگرگونه ساخت اما از میان برنداشت؛ اکسپرسیونیزم هم با رهاسازی عناصر رئالیستی، آنها را در پوششی از شگفتی ها و نوادر عرضه نمود. با وجود این از اواخر قرن پیش دست اندرکاران تئاتر کوشیدند تا این بی فکری را که در حقیقت روح زمان به نویسندگان تحمیل می نمود، مورد تردید قرار دهند. و این خود نیز نتیجه منطقی مرتبط با تاریخ گرائی بود که سرانجام گفته شد، این درست نیست که دنیای تاریخی درام ها را به همان ترتیبی که واقعیت داشته، به نمایش درآورند، بلکه باید آن را همان گونه که نویسنده دیده است، نشان بدهند. و بدینسان کشف مجدد تئاتر الیزابتن و سامان دهی «صحنه های شکسپیری» نیز مطرح گردید (ابتدا در شهر مونیخ – 1889). بر همین فرم صحنه ای ضد تخیلی، بعدها برتولت برشت اساس تئاتر حماسی – توصیفی (اپیک) خود را پایه گذاری کرد. اکنون باز نوعی روح دیگرگونه زمان، دورانی که خود را علمی می شناخت، به شکسپیر نزدیکتر شده و علم و دانش را به یاری می طلبید.
همزمان گام منطقی دیگری هم، قبل از همه در خود انگلستان (جائی که گرنویل- بارکر به سال 1912 در سه اجرای شایان تأمل، بریدن از سنت ویکتوریائی را شکل داده بود) برداشته شد: اگر افرادی در جستجوی عصر شکسپیر هستند باید به حد کافی هدفمند بوده و بگویند، شکسپیر آن درا م ها را برای دوران خودش نوشته است، پس ما هم باید با آثار او در جستجوی عصر خودمان باشیم. و به این ترتیب مسئله شکسپیر و البسه مدرن در زنجیره ای از اجراها مطرح گشته، که از دهه بیست تا به امروز هم هنوز گسستگی نیافته است (در شهر برمن آلمان، پترتسادٍک با «هٍنری پهلوان» خودش، این روزها حلقه ئی هم به آن افزوده است). در کشور ما (آلمان) خیلی ها علاقه دارند که اینگونه نمایشهای کلاسیک را با غرور خاصی به اجرا درآورند.ما نمی خواهیم انکار کنیم که گاهی هم ایجاد جذابیت و شور و هیجان ضرورت پیدا می کند. البته دلایل کارگردان ها را هم در این زمینه بسادگی نمی توان رد کرد. یکبار گفته می شود: شکسپیر در حقیقت درام هایش را برای ابد ننوشته بلکه آنها را برای همعصران خود نگاشته است، درست مثل اٍشیلوس یونانی، کالدرون اسپانیایی یا مولیر فرانسوی؛ حتی گریک بزرگ هم نقش مکبث را در لباس یک آدمیرال دوران خودش ایفا می نمود. از طرفی هم، روشنفکران و افراد با فرهنگ درام ها را انقدر می شناسند که دیگر نیازی به حقیقت رخداد و کارکترها نیست؛ آری باید آنها را از پوشاک آشنا و همچنین البسه آنچنانی برهانیم تا به تماشاگران نشان دهیم، اجرائی که بر صحنه در جریانست مربوط به خود آنهاست.در این راستا، تایرون گوتری، مرد بزرگ و کهنسال آثار شکسپیر، چند سال پیش و در اجرائی از «ترویلوس و کرسیدا» کار را به جائی کشانده بود که دوران مطروحه در اجرای جنگ تروا را هم از آن خود می شمرد.به تصور من این حرکتی است شتابزده که لباس مدرن را از اساس رد کنیم؛ در هر موردی باید بررسی کرد و دید کدام موتیوها برای اجراء کاربرد دارند و تا چه حدی هدف مورد نظر برای تجسم و اجرای صحنه ای درام نویس - و نه کارگردان - را به حرکت در آورده است. می بینید که موضوع اجراء و تجسم صحنه ای آثار شکسپیر هم مثل بسیاری از پدیده ها خود به مسئله ای بدل گردیده است. از یکسو ما می خواهیم بنابر هشدار برشت در رابطه با (هراس از الگو سازی) به کارمان بپردازیم و با سنت شکسپیری آلمانی ها - آن سبک محکم و غول آسا - که برای قشر های نیمه متمکن خیلی گران تمام می شود، به مخالفت برخیزیم. از طرف دیگر جریان ها به ما آموخته اند - نظریه آلفردکر 1906 - که اصولاً اعتماد نکنیم،البته ما بزرگتر از شکسپیر نیستیم اما دوران ما پیشرفته تر از زمان زندگی اوست. خواست برشت هم این است که آثار شکسپیر را کاملا از زمان حال جدا سازیم و تاریخی شان کنیم، زیرا که اینها با شناخت های کنونی شرایط اجتماعی همخوانی ندارند. اصالت کار های شکسپیر، زمانی که اطمینان به چیز های تازه و حتی آینده هم از میان رفته، اهمیت بیشتری نیز کسب می کند. طبعاً برای یک کارگردان فکور روشن است که به هر طریق باید در اجرا هایش، دوران خود، بازیگران و تماشاگران را نیز مد نظر داشته باشد. این را هم باید بدانیم که آثار شکسپیر را به این دلیل نمی توانیم به صورت ناب و اولیه به صحنه بیاوریم که ما در جهان دیگری زندگی می کنیم و نمی توانیم آنها را بعدازظهرها و در فضای باز اجراء کنیم، اگر هم می توانستیم چنین نمی کردیم چون به هیچ قیمتی حاضر نیستیم از تأثیرات نور شگفت انگیز و ویژگیهای تئاتر امروز دست بکشیم.
اجرای درام «رویای شب تابستان» آنهم به هنگام روز و با به کار گیری مشعل هایی که خطر آتش سوزی به همراه دارد، البته با شکوه است، با اینهمه ما دیگر نه می خواهیم به آن واقعیت تن بدهیم و نه می توانیم؛ در این زمینه هم هیچ شکی وجود ندارد. آنچه گذشت برای کارگردان مدرن امروز کاملا واضح است. پدیده ای نو، و برای عصر ما ویژه، که کارگردان نباید از ان غافل بماند؛ او اجرای خود را نباید بر جریان های غیر قابل کنترل استوار کند و با در نظر گرفتن دگرگونیها به درک متن شاعرانه توجه ویژه مبذول داشته و با بررسی دقیق ان به کار خویش استحکام ببخشد. در اینجا مسئله اصلی بازگو کردن و نمایش زمان حال است و نه زنده کردن خود درام نویس یا کار اجرائی او. و بدینسان کشش و انعطاف میان متن شکسپیر و اجرای مورد نظر، بین کلام ارائه شده و انسان زنده نیز بیشتر می گردد. کارگردان آگاهانه ابعاد میان متن و امکانات تئاتریش را گسترش می دهد (امکاناتی که در مقایسه با تئاتر شکسپیر تغییر یافته اند). بهرحال، این اوست که در حین تمرینات به این کشش ها و جذابیت ها واقعیت می بخشد. کار اجرائی باید گویای آن باشد که کارگردان از متن به شور و هیجان آمده و نه بر عکس. او زمانی به این مهم می رسد که کشش ها را در هر صحنه بکار بیندازد، کشش و رابطه میان عناصر اصیل شکسپیری (چیزی که بدون دانش قابل شناخت نیست) و زمان حال، زمان حالی که از اصل موضوع نیز چیزی کم ندارد، به کلام دیگر همان چیزی که در درام شکسپیر هم نهفته است. حال ببینیم این معضل را چگونه می توان حل و فصل کرد؟ برای این پرسش به نظر من تنها پاسخ بسیار ساده وجود دارد؛ این هر دو اصالت در یک چیز فصل مشترک دارند - در ایده و بیان تجسم زمان حال. اِشیلوس، کالدرون، مولیر و شکسپیر همان گونه که اشاره شد برای تماشاگران زمان خود نیز نوشته اند. اگر درام های آنان توانسته اند قرنها دوام بیاورند، پس باید چیزی بجز مسائل آن زمان - و احتمالاً گذرا - در انها موجود بوده باشد، چیزی که برای تماشاگران اعصار بعد هم تازگی داشته است. کار مستمر و علمی کارگردان مدرن امروز باید بیش از همه در این سمت و سو باشد و در دوران درام به کشف آن چیزی نائل آید که نگارنده آن قصد داشته آنرا به همعصران خویش بگوید. نکته ای که از همان دوران در متن بوده و به دست ما هم رسیده است. البته نباید در جستجوی ارزشهای به اصطلاح جاویدان بود، بلکه باید به واقعیت پایداری دست یافت که امروز هم تازگی و اهمیت دارد. نمونه ای در این مورد: قدیمی ترین تراژدی که در اختیار ماست، دوهزارو چهارصدوسی وشش سال قدمت دارد «ایرانیان» اشیلوس که یک اثر ضد جنگ است. اشیلوس آنرا نوشت تا به مردم کشورش در رابطه با سیاست امپریالیستی هشدار بدهد؛ او بدین وسیله توانست پیامدهای جنگ را در قالب سرنوشت یک پادشاه شکست خورده به صحنه بیاورد. و این همان چیزی است که من آنرا «واقعیت پایدار» می نامم.
حال باید دید که آیا در متن موجود شکسپیر اشاره ای دال بر چگونگی اجرای این «واقعیت ثابت» وجود دارد یا نه؟ به باور من، اینگونه اشارات موجودند. ما در وضعی هستیم که می توانیم به یاری علم و دانش و همچنین با آگاهیهای دورانمان خواستهای عینی و ضروری را به مدیریت و کارگردانی بقبولانیم - البته این می تواند بسیار گستاخانه تلقی گردیده و در نتیجه مخالفت هائی را هم برانگیزد. ما در این جا نمی خواهیم دستورالعمل جدیدی برای اجرای آثار شکسپیر بنویسیم. اما موضوع مهمی مطرح است که باید مطرح گردد، البته اگر بخواهیم به سنت گرائی های راینهارت، یسنِر و فهلینگ در رابطه با اجرای اثار شکسپیر خط بطلان بکشیم. به اثر و خواستهای آن باید به دقت توجه کرد به خواستهائی که برای دوران شکسپیر همانقدر اعتبار داشت که برای امروز ما نیز معتبر است و باید هم چنین باشد.
در اینجا به پاره ای از توضیحات پیتر بروک رجوع کنیم.
1- صحنه
سن تئاتر شکسپیری صحنه ای بود بی پرده و سکوئی کمابیش بدون دکوراسیون که همانند تئاتر تخیلی «گوک کاستن» بوسیله «دیوار چهارم» (=پرده) از تماشاگران جدا نمی گردید. پر واضح است که چنین صحنه ای با آنهمه نشانه های ویژه در مقایسه با تئاتر امروز دارای تفاوتهائی نیز هست. آنها هر طوری که می خواهند راجع به رئالیزم موضع بگیرند، بگیرند- (رئالیزم بر صحنه های ما حکمفرماست و به طور یقین تا زمانی که ما اثار ایبسن، چخوف، هاوپتمن گورکی، اونیل یا تنسی ویلیامز را به اجرا می گذاریم، نیز همین گونه خواهد بود) - اما یک مسئله غیر قابل انکار است: دکوراسیون رئالیستی این روز ها از نظر اقتصادی بیشتر مقرون به صرفه است در اینجا هم دیگر نمی خواهند جذابیت های کاذب را برجسته نموده و صحنه را با چیزهای کهنه و خرت و پرت پر کنند، اشیائی که فتوگرافی آنها را لو می دهد. درست در همین راستا نمایش بازیگر هم صرفه جویانه تر شده؛ فیگور هم دیگر با آن سبک و سیاق بازیگران رئالیستی قدیم نیست؛ بازی بازیگر به یکسری حرکات ویژه و منفرد و مشخص مزین نبوده و به قول برشت: به رفتار اساسی فیگورها باز می گردد. آن از میانه به حرکت در آمده و در جزئیات به صرفه جوئی می پردازد. صحنه تئاتر شکسپیر در این معنا نیز می تواند بگونه ای رئالیستی بررسی شود. البته اجباری در این کار نیست. فقر دکور - که ما از آن با احتیاط یاد می کنیم - را می توان از طریق سور رئالیستی و یا حتی آبستره هم به بررسی نشست.
برای مثال:
جزئیات بهم پیوسته نمادین که از اتحاد برخی عوامل نمونه وار و موثر برجستگی یافته اند، می تواند سور رئالیستی باشد. آبستره هم به نوبه خود صحنه ای خواهد بود که با هر هماهنگی از واقعیت چشم می پوشد، برای نمونه، صحنه عریانی که بر آن ژاک کوپو، پدر تئاتر مدرن فرانسه، در سال 1914میلادی اجرای نمونه وارش را از درام «انچه شما می خواهید» به نمایش درآورد. مسلم است که آثار شکسپیر بر روی چنین صحنه هائی که با صحنه اصلی او نیز مطابقت دارند، می توانند به اجرا درآیند. نا گفته نماند که در این صورت فقط فضا آبستره است و نه بازی؛ حتی لباسها هم تا حدود معینی می تواند آبستره باشد. چرا که اینها هم به گونه ای ملموس بیانگر شکل و شمایل جسمانی سیماها هستند؛ و همچنین ابزار صحنه ای از قبیل: میز و صندلی و ... قطعات دکوراسیونی بکار رفته را هم می توان در اشکال آبستره به معرض تماشا درآورد (مانند اجرای «رویای شب تابستان» توسط زلنر) ولی تمامی اینها هرگز به طور کامل غیر ادبی نخواهد بود (= نا نوشته؛ برای اینکه به زبان نقد هنری سخن گفته باشیم)، زیرا که با وجود این نیز رابطه ای با درام، صحنه و داستان و انسانها هم دارند؛ به علاوه در راستای اجرا و کار عملی پائین تر از ادعا ها و اهداف تئاتری قرار می گیرند: به کلامی دیگر، اینها باید برای آکسیون قابلیت داشته باشند. برای تازگی و تجسم درام شکسپیر البته فقر دکور تا آنجا اهمیت دارد که بدانیم تزئینات هرگز نقش کلیدی را نباید داسته باشند. هر تأثیر و تأثر عینی که توجه چشم تماشاگران را از حاملان آکسیون منحرف کند، بیهوده است. این تمام آن چیزی را که دانشوران «دکور کلامی شکسپیر» نامیده اند، ویران می کند. در اجرای اینگونه درام ها چشم انسان هائی را دنبال می کند که گوش هم متوجه حرفهای آنهاست، و جز این دیگر هیچ. دکور تنها و تنها یک وظیفه عمده دارد: باید فضای صحنه مدرن، این جعبه بزرگ و تهی را چنان تجهیز نماید و زمینه را به گونه ای آماده سازد که بازیگر بر آن هر چه برجسته تر نمایان بشود. (کاسپارنهر جزو نخستین افرادی است که این اصول را بکار بست.) درباره فقر دکور - که باید خیلی هم جدی گرفته شود - یک مسئله عینی و منطقی دیگر هم مرتبط با اجراء وجود دارد. مدتهای مدید برداشت از شکسپیر و درام او مطلوب نبود، چرا که سختگیری و استحکام فرم او، دقت ساختار آثاری وی و روشنی طرح او به درستی درک نگردیده بود، یا اصولاً چنین خواستی وجود نداشت. آنها با چشمانی به تئاتر می نگریستند که به تئاتر «گوک کاستن» ( شهر فرنگی) عادت داشتند، انبوهی از صحنه های کوچک و فرار را می دیدند و همچنین صحنه ها را هم بنوبه خود در قالب دکور مشخصی تصور می نمودند. آنتراکت های کمابیش طولانی تغییرات که چرخاندن صحنهء گردان را تا حدودی تقلیل می داد، ساختار درام ها را به قطعاتی تقسیم می کرد که قبلاً بدون مکث و یا شتاب انجام می شد؛ مضافاً اینکه با استفاده از امکانات باید از طبقات مختلف صحنه هم بهره برداری می گردید. فقر دکور به شکسپیر اجازه می داد که به سرعت برق و باد صحنه ها و فضاها را جابه جا کند؛ و تخیل و فانتزی تماشاگران هم خود خواسته در همین مسیر حرکت می کرد. چقدر خوب بود اگر تماشاگران ما هم - در این دوران و انفسای بدون فانتزی - بار دیگر حاضر می شدند خیال و فانتزی خودشان را به حرکت درآورده و از چوب زیر بغل توهمات چشم می پوشیدند. همان طور که گفتیم، طراحی خوسردتر از شکسپیر نمی توان یافت؛ او از نظر دقت و تیزبینی حسابگرانه شاید فقط از سوفوکلس یونانی کم بیاورد. برشت که از فهم و شعور بالائی برخوردار بود، در مقایسه با این سلطان فرم فقط یک بچه یتیم است؛ فرم او بسیار منطقی و محکم و از ضرورت های دقیق و ریزبینانه روند داستان و ساختمان صحنه برخوردار بود. حتی تظاهرات و خودنمائی های مضحک ترین ابله هم از نوعی منطق درونی برخوردارند که ماهرانه تر است از پنداشت های روشنفکرانه یک نویسنده، چرا که همه اینها بیش از همه به منطق ناخودآگاه او تکیه دارد. راجع به این مقوله در جای دیگر سخن خواهد آمد. اینجا مسئله از این قرار است که نشان دهیم سن بدون دکور زمانی ضرورت می یابد که بتوانند ساختار حساب شده درامها را آن طوری به معرض تماشا بگذارند که درام نویس با وجود صحنهء کم و کور در نظر داشته است. این البته چیزی را از کارگردانان می خواهد که به زعم من تا کنون عرضه گردیده و در مواردی هم واقعیت یافته است، و اینهم چیزی نیست جز استحکام و قدرت فرم که باید در هنگام اجرا بکار گرفته شود. ویلیام شکسپیر با چنین نیروئی عصر باروک را به طور کامل درهم نوردید؛ و بدینسان پیشگامان و همعصران خویش را هم پشت سر نهاد؛ او ان طوری که ولتر و دیگران تصور کرده اند «یک وحشی مست» نیست که نگاهش را خیره به تئاتر «گوک کاستن» (شهر فرنگی) توهمی دوخته باشد، تئاتری که وقتی با به اصطلاح بی قاعدگی درامها شکسپیر مواجه شد، چاره ای ندید جز آنکه اینها را قطعه قطعه کرده و بد قواره نماید. زلالی ساختار نمایشی شکسپیر شایستگی انرا دارد که با همهء غنای پر شاخ و برگ و نظم فوق العاده اش «کلاسیک» (عالی) نامیده شود. آری، بر صحنه کم دکور امروز هم می توان آثار روشن و با استحکام و در یک کلام «کلاسیک» شکسپیر را به تماشاگران عرضه نمود. (البته این با آنچه که استیل نام نهادهاند هیچ ارتباطی ندارد)
2.زبان
متن شکسپیری به نوعی عنصر بیانی محکم و چشمگیر اشاره دارد: دگرگونی نظم و نثر. آنان که در انگلستان و فرانسه اجراهائی را از آثار شکسپیر دیده اند، می دانند که در آنجا این دگرگونی برای بازیگران هیچ مسئله ای را نمی آفریند. اما برای بازیگران آلمانی این ظاهراً مشکل آفرین است. این مسئله را به سهولت می توان شناخت چون بر آن تکیه می شود. زمانی بود که تئاتر خوب را در آن می دیدند که اشعار را به صورت تکلم معمولی بیان نمایند. ابیات را جزء جزء می کردند، ریتم آن را هم به صورت نثر حتی المقدور نه چندان رفیع تغییر می دادند؛ آنها بدین طریق مقام و درجهء ابزار هنری زبان را تا حد یک وسیله تفهیم تنزل می دادند. این دوران البته سپری شده. اما از همان دوران زبان آلمانی بر صحنه تئاتر ما هنری است که اشعار را بدل به تکلم معمولی می کند و در این زمینه آنقدر کاستی وجود دارد که حتی برخی از منتقدین به خود اجازه می دهند به یکی از مشاهیر بزرگ این هنر – گروندگنس – حمله کرده و بگویند او آواز می خواند. هراس از موسیقی شعر در پس کله بازیگران، استادان و کارگردانان تئاتر ما نشسته است. البته مدتی است که توافق شده دست به ترکیب اشعار نزنند. از طرفی، کارگردانها اشعار را در نوعی از بهم فشردگیها جای می دهند که روی بدن اثر گذاشته و میمیک و ژستیک را هم منجمد می سازد. ناظران خارجی در این مورد از «سبک یخ زده» آلمان سخن می گویند. شعر بر روی صحنه یک فرم ادبی نیست. آن همان طوری که الیوت به زیباترین وجه نشان داده و برشت هم بر آن تأکید دارد، شکل اصیل بیانی تئاتر است. بیان رفعت یافته طبیعی که به صورت صحنه عریان به نمایش درمی آید. شعر در حقیقت کلامی است موزیکال. این بنا به قول مارسل پروست که راجع به ستاره بزرگی که اشعار را به زیبائی هر چه تمامتر بیان می نمود، نظر داده بود؛ «خود همان ایده است که یک شعر بیان می کند». و هیچکس آنرا همچون شکسپیر با این ژرفا نشناخته است. اوبرون، هنگامی که همهء چیزهائی را که زبان قادر به گفتنش بود، گفت؛ ندا درمی دهد: موسیقی وتیتانیا هم در پاسخ می گوید: «بله، موسیقی !» شعر تا لحظهء آغاز موسیقی، شوری بپا می کند. آن انسان سخنگو را در کشاکش ریتم و اوزان و سیلابها به وجود می آورد. شعر به او بال پرواز می دهد. شعر به بازیگر الفاظی را القا می کند که درام نویس در نظر داشته. اما همزمان زبان را هم منطقی تر می سازد. شعر فراز و نشیب هائی را امکان پذیر می سازد که نثر هرگز قادر به آن نیست. تحقیر متداول فن بیان در سرزمین ما دال بر کج فهمی ماست از گفت و گوهای تند و سریع هنر اقناعی وکلای دعاوی. یونانیان الهه ای داشتند «په ایتو» نام که در آخرین قسمت تریلوژی اورستی توسط آتنا فرا خوانده می شود تا کاری را به انجام برساند که هیچ کس امکان پذیر نمی دانست: آشتی الهه های انتقام با قدرت اقناع که آنان را به «اویمنیدها» بدل می ساخت. شعر فهم و عقل می خواهد و نه تنها احساس. اشعاری این چنین البته در آلبوم ویژه ای درج نگردیده اند که ما آنها را با کلام قشنگ، اما اکثراً بر خلاف معنایشان «شور و اشتیاق» بنامیم؛ این شور و اشتیاق در اختیار ماست. الیوت می گوید: شکسپیر شعرش را تا بالاترین حد کمال تکامل بخشید، بخاطر هدف خاص در اماتیکش، و چون او آنها را برای صحنه نگاشته از اینرو به مقام بزرگی هم از شعر نیز رسیده است. و هم او در جای دیگر می گوید: نظم زمانی به شعر بدل می شود که موقعیت در اماتیک به چنین درجه ای از شور و هیجان رسیده باشد؛ در این حالت شعر تبدیل به بیان طبیعی می گردد، زیرا در چنین شرایطی آن تنها زبانی است که می تواند همه تحرکات احساسی را بیان کند. درست همین طور است. هیچ بازیگری نباید بر این باور باشد، که وقتی صدایش را بالا می برد و خویشتن را به چیزی می سپارد که «روند احساس» نام نهاده اند، می تواند اشعار را بیان نماید. یک شعر فقط زمانی زبان رفیع است که در آن مفهوم و روح و اندیشه به صدا درآید. و این تکلیفی است شگرف برای بازیگری که نقش می آموزد. اما، در کشور ما چگونه عمل می کنند ... برای بازیگران ما تغییر و تبدیل از شعر به نثر و از نثر به نظم هنوز هم مشکلات بزرگی را می آفریند. و این همان چیزی است که گرانویل – بارکر به آن اشاره دارد:
شکسپیر، وسیله تعیین کننده ای برای ساختن ترکیب و بنا. اشعار استتار شده درام های اجتماعی الیوت و دگرگونی بین نثر و آواز در کار برداشت البته تأثیر می گذارند، اما در مقایسه با خواست شکسپیر در این زمینه، بسیار ساده اند. با اینهمه آنها هم کارگردان ها و بازیگران را حداقل مجبور می کنند تا فضای نثر ناب را در درام های مدرن ترک گفته و بدین سان به بیان شعری اهمیت بیشتر و تازه تری بدهند.
3 – جهان
دنياي شكسپير كامل و همگاني است. معني اين را هنگامي درمييابيم كه «هملت» يا «لير» را با «فدرا»ي راسين، يا با «تارتوف» مولير، «ايفيژني» گوته، «مارياستوات» شيلر، «نورا»ي ايبسن، و يا با «بافندگان» هاوپتمن مقايسه كنيم – همه اين آثار داراي يك سبك و سياقاند كه در اثر محدوديت بر قسمتي از دنيا به وجود آمدهاند. شيلر فقط يكبار، دنياي گستردهاي را كه شكسپير ميخواست، بر صحنه عرضه كرد، در درام «ويلهلم تل». اما در همين جا هم جاي طنز خالي است، عنصري كه وجودش در دنياي شكسپير ضروري است؛ البته در نمايشنامه «تل» هم ملت به زبان شعر سخن ميگويد ولي اين هم نوعي ويژگي ايدهآل است. تنها يك نفر همانند شكسپير تمامي دايره آفرينش را سير كردهاست، گوته در «فاوست»؛ در پرولوگ آن چنين ميخوانيم: «از آسمان و در دنيا به سوي دوزخ». در تئاتر اليزابتن هنوز هم آن سه اشكوبهء تئاتر ميسترين وجود داشت كه به همين نام هم خوانده ميشد. اما شكسپير به اينهم اكتفا نكرد. او هر طوري كه ميخواست از اين طبقه به آن طبقه ميرفت. او جهنميترين گناهان و پلشتترين چيزهاي اعماق را نشان ميداد؛ او جادوگران، ارواح و مردگان را به صحنه ميآورد؛ آسمان او نه فرشته ميشناسد و نه قراولان بهشتي را؛ ولي پوك و آريل از آن بيرون ميجهند. دنياي ارواحي نامرئي وجود دارد كه هم به عنوان آسمان بربالاي سن گنبدي شكل قرار گرفته و هم به منزلهء دوزخ در زير آن خميازه ميكشد. تختهپارههاي نازكي كه انسانها بر رويشان به اعمال و رفتارهائي ميپردازند يا به تصر آنها چنين است، نشانگر زودشكن بودن همان چيزي است كه ما آنرا زميني ميناميم. براي صحنه مدرن اين يعني جهان، پله و مرتبه دارد. مهم نيست كه تصوير صحنه يا چوببست سن آنرا با هم آشكارا يا حتي شماتيك نشان ميدهد. پلهها بيش از همه كمكي است براي تقويت نيروي متخيله: ما بر روي كدام پله صحنه داريم، يك انسان بر صحنه و يك صحنه با انسانهاي بسيار؟ اين هم يعني كدام پله نياز به سخن دارد، زبان – اينجا يا آنجا؟ هنگامي كه هملت با بازيگران سخن ميگويد، روي پله ديگري است تا زمانيكه به مونولوگ ميپردازد يا وقتي كه جمجمه يوريك را در دست دارد.
بايد درباره دليل انتخاب اين پلهها از طرف شكسپير براي هر صحنه بررسي شود تا بتوان آنرا در شيوه نمايشي بكار بست. اينجا ساختار تغيير و تبديل بين شعر و نثر از طريق فرم و ظواهر رشد و گسترش مييابد. شكسپير پلههاي روشنفكران، حكام، مستان، كارگران، عشاق يا زن قاتل را به سهولت برگزيده است. او در درون روند دراماتيك به انتخاب پرداخته و قهرمانان خويش را ميسنجد، و باز هم بر روي پلههايي كه اينان از موقعيتي به موقعيتي در حركتاند. بهرحال اين همان بازي بر روي پلههاست كه نميگذارد ما در قالب فيگورها، تيپهائي را به نمايش درآوريم (براي مثال: آثار راسين و مولير)، و آنان را – براي اينكه از كلام برشت استفاده كردهباشيم – با تمام تضادها هر چه انسانيتر نيز نشان بدهيم. اين سيماها چهارچوبه محكم و فيكس چهرههاي آثار شيلر يا ايبسن را هم ندارند. اينان به ندرت با خويشتن خويش كاملاً هماهنگاند.
4 – انسانها
شكسپير كه وي را بزرگترين خالق كاركترها ناميدهاند، مهمترين كاراكترهايش را به اين انديشه ميافكند كه آنها ديگر نميدانند كه هستند؛ لير: «آيا كسي در اينجا مرا ميشناسد؟ نه، ابن لير نيست؟ آيا لير اينگونه راه ميرود؟ آيا او اينگونه سخن ميگويد؟ چشمان او كجايند؟ سر او بايد ضعيف شدهباشد، يا قواي فكرياش در خواب مرگ. آه، من بيدارم، اينطور نيست؟ چه كسي قادر است به من بگويد من كه هستم؟» او وقتي اين حرفها را ميگويد، هنوز ديوانه نيست، اما ديوانگي او نتيجه همين پرسشهاست. اين دگرگوني موضوع درام را تشكيل ميدهد: «دنيا، دنيا،آه دنيا/ اين دگرگونيهاي شگفتانگيزت؛» و مكبث هم جز اين چيزي نميگويد: «انزجار گذشتهها كمتر از دهشت توهمات نيست/ انديشه من كه در آن جنايت هم تنها شبحي است/ مردانگي درون مرا چنان به حركت درميآورد/ كه همه نيروي حيات به جنون ميرسد/ و هر چه هست هيچ است و هيچ. «الههء جادو: «ايمني، بدترين دشمن بشر است.» - اتللو، با ترس و لرز از خويشتن خويش: «من آن چيزي نيستم كه هستم.» - كوريولان: «آيا شمايان مرا در برابر وجود خودم بيوفا ميخواهيد؟ همين بهتر كه مرا به بازي فرمان دهيد، من همينم.» اين ناهماهنگي فرد، اين صراحت شخص، اين عدم هماهنگي من با خويشتن خويش البته با آنچه كه پيراندلو و تئاتر آبسورد مدرن (پوچي) ارائه ميكند، شباهتي ندارد.
شكسپير تا حدودي اينگونه چيزها را از پيش پا روبيدهاست، او يك واقعيت محكم و استوار، خودشناسي و بالاخره زندگي را به نمايش درميآورد. آيا اين نوعي نمايش آبزورد (پوچي) نيست كه ما در برابرش قرار گرفتهايم، يا چيزي كه در وجود ما پنهان است؛ البته سنجيدهتر از آنچه كه در كار يونسكو يا بكت به چشم ميخورد؟ هر دوي اين نامبردگان ميپذيرند كه نامربوطي و بيمعنائي چيز غيرقابل شناخت نيست و آنرا تماشاگر ميتواند بشناسد؛ خود آنان هم تصديق مينمايند كه اين بيهودگي نميتواند تعيينكننده و قاطع باشد و اگر اين چنين باشد هم شناخت و هم شناسنده بيهوده خواهندبود – حال اين سئوال مطرح ميشود كه در چنين حالتي اصولاً چرا بايد باز هم درام بنويسند و به اجرا درآورند؟ در همان حالي كه نويسندگان تئاتر پوچي از چهرههاي نمايشي خود فاصله ميگيرند (با اين احتمال كه تماشاگران هم خودشان را از آنها دور نگه خواهند داشت)، شكسپير ترديدي نميگذارد كه وضع خود او هم بهتر از آنها نيست – با وجودي كه براي او نيز اعمال و رفتار روشن است، بالير يا هملت و يا پروسپرو تفاوتي ندارد: «ما همه از يك مادهايم، مثل خواب و رويا، و اين زندگي كوچك را خوابي احاطه كردهاست.»
اثبات اينكه يك شاعر و نويسنده بزرگ در حدود سيصدو پنجاه سال پيش به شناختهائي راجع به موجوديت بشر و بشريت پي برده كه امروز هم تازگي دارد، معناي ديگري ندارد جز آنكه بگوئيم ابن جا مسئله ثبات و يكساني زندگي بشر وراي همه دگرگونيهاي تاريخي – اجتماعي مطرح است. به همين دليل هم شكسپير را نبايد تاريخي كرده و به دوراني بسپارند (آنگونه كه برشت تصور ميكرد). پادشاهان و افراد خشن و مسخره او را بايد همانند مردمان خود بشمار آوريم. اگر ما حكام و ملت ها را در برابر هم قرار دهيم، به نتيجه ديگري جز همين جنبه زندگي نخواهيم رسيد؛ همانطوريكه همساني انسانهائي كه در قدرتند در رابطه با اين قدرت ترديدآميز است، همساني خود اينان هم با قدرت شك برانگيز است (علت بوجود آمدن تراژدي: لير)؛ و همچنين همساني مردم ناتوان با ساختار اجتماعي بيقدرتي كه آنها در درون آن زندگي ميكنند. شك و ترديد شكسپير در رابطه با «مردم»، همينكه به عنوان مجموعهاي بپا ميخيزند، ديدگاه او در زمينه دمدميمزاجي تودهها، آمادگيشان براي گمراهي و ... با علم روانشناسي مدرن تودهها قابل اثبات است. شك و ترديد او در برابر «شكوه» قدرت، موضوع و تم اصلي تراژدي «ريچارد سوم» است: در پايان چه ميماند؟ «امپراتوري من براي يك انسان!» قدرت هرگز ظالمانهتر از اين استهزاء نگرديدهاست. در درام «هنري ششم» كه به ندرت اجرا ميشود، پادشاه – يك صاحب قدرت خوب و همين دليل ضعيف و ناتوان – به پرسش مردي از ميان تودهها پاسخ ميدهد كه او كيست: «بيش از آنچه كه به نظر ميرسد، و كمتر از آنچه كه در تولد بودم. يك انسان، كمتر از آن كه نميتوان بود.» لير: «دارو بخور، آه اي شكوه و جلال! خودت را تسليم كن! براي يكبار هم كه شده، چيزي را كه فقر احساس ميكند، احساس كن!» و باز هم لير در آخرين پرده: «ما از دربار ميشنويم كه ملت بيچاره حرف ميزند/ حرفهاي زياد/ اينجا هر كه ببرد نيز باخته است/ بيرون و درون الطاف، يا چنين ژرفا/ با اينهمه رمز و راز، گوئي ما پيامبريم/ خداوند (و راز چيزها را چنان بالا ميبرند كه گوئي ما جهان خدائيم). و ما هم اينگونه زندگي را ادامه ميدهيم/ در زندان جدائي و دسائس بزرگان/ آناني كه باماه و مد آب فرو ميروند.» در پرسپكتيوهائي اينچنين دنيا و انسانهاي شكسپير به حقيقتي ميرسند كه تجربه گرديده و به نمايش هم درآمدهاند، حقيقتي كه در هر زمان قابل بيان است. و اين همان چيزي است كه من آن را ايده تجسم زمان حال ناميدهام
دانیال حیدری : کارشناسی نمایش
برگردان به فارسی: مسعود نجفی
دانیال حیدری
گروتفسکی در کارش بر روی بازیگر، ریشههای عمیق و مدفون"تکانهها"(2) و واکنشها را کشف میکند تا از این طریق بتواند ابزارهای کنترل و هدایت آنها را بیابد.
او میخواهد"درها را بگشاید". درهایی که با ترسها و ممنوعیتها بسته شدهاند؛ بدن را مسدود و محدود کردهاند و آگاهی را از کار انداختهاند. او چنین چیزی را طلب میکند، حتی اگر به طرز وحشتناکی خشن به نظر بیاید. او تغییر کرده است؛ آشنایی و دریافت ما از او نیز تغییر کرده است. دیگر همان آدم کوچک جثهای نیست که پشت عینک مشکیاش مخفی میشد؛ حالا او با صورتی برهنه در"مرز" تئاتر قدم میزند. گروتفسکی عوض شده اما هدفش همچنان ثابت مانده است: باز کردن درها و ارادهای ثابت قدم که مدام تکرار میکند: درها را باز کن. او با تمام مشکلات و حاشیههای فرعی و اداری معمول که در کارش وجود داشت، فرصتی را برای رویارویی به دست آورد و با ذکاوت دقیق و هوش سرشار خود، ذهنیت تصویریاش را اعتلا بخشید. او تشویق و اضطراب را در پردهای از طنز و شوخی میپوشاند و کارش را با یک انرژی فرابشری پی میگیرد؛ تاکنون کارگاههای اجرایی زیادی در سراسر جهان برگزار کرده است. در لهستان، اسکاندیناوی، آمریکا و حالا در فرانسه. (کولت گودار)
گروتفسکی میگوید: فعالیتهای این مرکز در دو جهت به کلی متفاوت و متناسب با نیازهای متفاوت مردم طراحی و انجام می شوند.
ما به نخستین بخش میگوئیم"Acting Therapy" اگر چه که هیچ ربطی به درمانهای پزشکی ندارد. موضوع مربوط به سلامتی افرادی که به ما میپیوندند نیست، بلکه بیشتر درباره کار آنهاست. اگر ما این ترمینولوژی را انتخاب کردهایم به این خاطر بوده که میخواهیم بر دو نکته پافشاری کنیم: اول از همه این که وجوه زیباییشناسانه به تصویر در نمیآیند و دیده نمیشوند. ما همه آنهایی را تمرین میدهیم و هدایت میکنیم که به صورت کم و بیش حرفهای، بدن و صدای خودشان را به کار می گیرند؛ مثل بازیگران و نیز به عنوان مثال"معلمها". دوم این که ما یک مرکز آموزشی یا یک مدرسه تکنیکی دایر نکردهایم. ما خودمان را به انتقال دادن دانشی محدود کردهایم که در بیش از 15 سال کار و فعالیت در تئاتر لابراتواریوم به دست آمده است.
ما به خصوص میدانیم که چطور سرچشمههایی را که در کار"صدا" آشکارا اختلال ایجاد میکنند با کنترل تنفسی و ماهیچهای محدود کنیم. میتوانیم عاملهای اصلی هجوم وحشت و اضطراب را توضیح دهیم. ما انتظار نداریم که برای همگان مفید باشیم. گاهی اوقات مشکلها از سرچشمههای بدنی یا روانی یا غیره سر بر میآورند؛ اینها مشکلهایی هستند که به زمان زیادی نیاز دارند تا بازسازی شوند. بنابراین ما خیلی واضح به مردم میگوئیم که نمیتوانیم کمکشان کنیم.
شما چطور افرادی را که میتوانید به آنها کمک کنید؛ تشخیص میدهید؟
در بیشتر اوقات یک مصاحبه درست و حسابی کافی است. از سوی دیگر ما بعد از یک فصل کاری آمادهایم تا تصمیم بگیریم."Acting therapy" به توجه مخصوص و از نزدیک به هر فرد نیاز دارد. در هر دوره این کار در گروههای کوچک انجام میشود. در ابتدا ما باید بتوانیم تعداد زیادی از دعوت شدگان (و یا درخواست کنندگان) را برای مشارکت قانع کنیم. با این هدف است که یک سری ورکشاپ که حدود دو هفته یا کمتر طول میکشند، سازماندهی میکنیم. علاوه بر این غیرقابل تصور است که از آدمهایی که شغل دارند و کار میکنند بخواهیم شغلشان را برای چندین ماه رها کنند.
رویکرد دوم این مرکز متفاوت است. ما به آن میگوئیم: پیش به سوی کوههای موازی(3). ولی این فقط یک تصویر ذهنی است. در کشورهای انگلوساکسون طرحی داریم به نام: پروژه ویژه؛ در بقیه کشورها کارهای ما را با عنوان فعالیتهای پاراتئاتری میشناسند. ما این نوع تجربهها را در 1970 م. آغاز کردیم. حالا اینها دیگر چیزی بیش از پرسشگری درباره یک پژوهش نظاممند نیستند: ما در جستوجوی فهم این هستیم که ملاقات بین دو نفر آدم واقعا چه معنایی دارد. بین یک فرد و دیگران. رویارویی او و فضا(خواه باز یا بسته) رویارویی او با واقعیتهای زنده و احساسی در جهان اطراف.
درباره فعالیتهای این مرکز این نکته باید روشن شود که چنین فرایندی هیچ ربطی به"گروه درمانی"(4) و یا"سوسیودرام"ندارد؛ همچنین هیچ ربطی به نوع بی نظمی رایج در"رها شدگی" و کلیشههای مربوط به "خلاقیتهای جمعی" ندارد. میشود آن را با بداههسازی در موسیقی جاز کلاسیک مقایسه کرد؛ با این تفاوت که ما در مرحله موسیقایی متوقف نمیشویم. ما تمام تکانهها را کشف میکنیم، تمام آن چیزهایی که میتوانند فرد را به جهان بدوی نزدیکتر کنند. بنابراین فرد باید بپذیرد تا همراه با ما تمام"دفاع"هایش[سدهایش] و کُدهای عادت شده اعمالش حرکت را آغاز کند؛ این امر به انضباط بسیار شدیدی نیاز دارد.
در این جا قرار نیست که با فرد مثل یک ابزار(5) رفتار شود؛ چیزی شبیه به تمرین مقابله با کمرویی یا تمرین تسلط بر خود و یا مقابله با ضعفهای فردی از راه به کار گرفتن چیزهای مصنوعی مثل مواد مخدر و یا الکل؛ در این جا ما به هیچ وجه نمیخواهیم که فرد نقش بیننده(6) یا مشاهدهگر را بازی کند. کسی که در اینجا درگیر میشود، در مسیر فعال شدن قرار
میگیرد.
درگیر چه چیزی میشود؟
درگیر نوعی عمل خلاقانه که هدفش خود فرد است و پیام آن به خود فرد میرسد. ما"کار" را برای تماشاگران آماده نمی کنیم؛ بلکه یک حرکت ایجاد میکنیم که فقط میتواند شامل خود فرد شود. او می تواند بگوید که"کار" حرکتی است به سوی فراگذشتن از خود؛ از چیزهایی که او آنها را به عنوان سدهای(7) بدنیاش میشناسد. به هر حال اگر اصرار داشته باشیم که از یک واژه گنگ یا غیردقیق استفاده کنیم باید بگویم: سدهای روحی.(8)
هدف این بخش از ورکشاپ افرادی هستند که به این نوع تجربه احساس نیاز میکنند؛ در یک گروه هنری یا تئاتری عضویت دارند یا ندارند اهمیتی ندارد. مثل همیشه راحتتر است که منظورم را با حذف کردن، مشخص کنم. من ابتدا با آن چیزهایی آغاز میکنم که به کار ما ربطی ندارند؛ این کار برای کسی که به سادگی میخواهد تا در زندگی یا تئاتر یا در بازیگری پیشرفت کند، نیست. واضح است که رها کردن بازیهای بازیگرانه هر روزه برای همیشه، کشنده و وحشتناک خواهد بود؛ اما در این جا باید همه آن چیزها فراموش شوند. همچنین برای فردی که به طور کلی از اعتماد داشتن به خودش عاجز است و یا فردی که فقط احساس شک و تردید دارد و از بدنش بیزار است نیز طراحی نشده است. همین طور برای کسی که مشکلهای روانیاش خیلی قوی است، طوری که از تعامل او با دیگران از ارتباط او با دنیای واقعی جلوگیری میکند، به درد نمیخورد. اینها همگی خارج از حد توانایی ماست. در این جا نیز آدمهای فوقالعادهای[استثنایی] هستند که تفکر تحلیلیشان به شکل پایدار بر تکانههای آنی و بیواسطهشان غالب آمده است؛ آنها حتی در احساس درد و هنگام رنج کشیدن نیز میدانند چطور به آن سوی شرطی شدنهای روزانهشان بروند. نویسندگان – این مشاهدهگران پرشور جهان– در فرایند نوشتن به سادگی به این هدف دست پیدا میکنند، بنابراین در طول ورکشاپ هیچ چیز جدیدی به آنها پیشنهاد نخواهد شد، حتی اگر خودشان مخالف این حرف باشند. از سوی دیگر میتوان گفت که ورکشاپ به کسی ممکن است کمک کند که مشتاق و کنجکاو است تا با مجموعهای از آدمها، که او میتواند آنها را از خودش بداند، در حالی که نمیخواهد خودش را تحمیل کند، رابطه برقرار کند. بنابراین در مورد فردی که نمیخواهد با خواستههایش بقیه افراد را مورد ظلم قرار دهد، شاید ورکشاپ سودمند باشد.
شما چطور داوطلبها را انتخاب میکنید؟
این یک انتخاب دوطرفه است. ما از یک گفتوگو شروع میکنیم. اگر آنها در این بخش به روشنی دلیل ادامه دادن را کشف کنند، یک قرار ملاقات میگذاریم. این قرار میتواند در شرایطی شبیه به ورکشاپ اتفاق بیافتد؛ این خودش میتواند یک ورکشاپ باشد یا یک نوع مقدمه؛ من هنوز نمیدانم، ولی تحت هیچ شرایطی این کار شبیه به امتحان، آزمون یا تستهای
مرسوم بازیگری در سینما نیست. گروه بین 5 تا 20 نفر تشکیل میشود. ما تمام تلاشمان را میکنیم تا بیشترین تعداد را از بین داوطلبان انتخاب کنیم. آنها همواره از ما میخواهند تا جدول زمانی کارمان را به صورت ورکشاپهای دورهای در زمانهای مختلف درآوریم. دو یا سه دوره کوتاه سازماندهی شدهاند و به زودی آغاز خواهند شد. همه کسانی که به ما میپیوندند در یک مسیر پویا(9) شرکت کردهاند. در آنها هیچ تماشاگری وجود نخواهد داشت.
منبع:
اطلاعات بینالمللی تئاتر(International Theatre information) زمستان 1976
پینوشتها:
1- Collette Goddard
2- Impulse
3- Towards a Parallel mount
4- Group therapy
5- Object
6- Observer
7- Limits
8- Spiritual Limits
9- Active Way
| به مناسبت سال روز درگذشت « آنتوان چخوف» | ||||||
| شاهکارهای نمایشی یک پزشک | ||||||
| ایسکانیوز: « آنتوان چخوف» نمایشنامه نویس وداستان نویس روسی در ابتدا پزشکی بود که درکمتر از 2 ماه ، تقریبا 1000 بیمار مبتلا به وبا را ویزیت کرد ولی با شروع زمستان و همه گیرى وبا ، چخوف کاملا از پاى درآمد. | ||||||
چخوف تحصیلات پزشکى خود را در سال 1879در دانشکده پزشکى دانشگاه مسکو آغازکرد. در زمان دانشجویى، براى گذران زندگى خود و خانواده اش ، صدها داستان کوتاه نوشت . چخوف دیپلم دانشکده پزشکی را در سال 1884 گرفت .تابستان آن سال برای استراحت به «بابکیو» رفت و در آنجا با «ساروین» مدیر روزنامه معروف پترزبورگ آشنا شد. نامه های چخوف به ساروین معروف است و این مرد ناشر غالب آثار بعدی چخوف می باشد. در سال 1886 اولین نمایشنامه اش را به نام «آواز قو» در یک پرده تنظیم کرد و در سال 1877 مسافرتی به جنوب روسیه داشت که تأثیرات خاص آن سفر در اثر معروفش به نام «استپ» آشکار است. آثار معروف چخوف در این سال عبارتست از «هنگام سحر» که مجموعه داستان است و «ایوانف» یک نمایش چهار پرده ای که هم در مسکو و هم در پترزبورگ به نمایش گذارده شده است. در سال 1888 با جمعی از دوستان و از آن جمله «ساروین» به کریمه رفت و در آنجا داستانهای معروف «استپ، روشنایی ها، جشن تولد، زنگها» را نوشت و لطیفه ای به نام «خرس» در یک پرده تنظیم کرد. در سال 1888 جایزه پوشکین به مبلغ 500 روبل به وسیله آکادمی علوم امپراطوری به او اعطا شد و در سال بعد عضو جمعیت دوستداران ادبیات روسی شد و در همین سال بود که نمایش «دیو جنگل» را در چهار پرده تنظیم کرد. لطیفه «خواستگاری» را در یک پرده و داستان معروف «افسانه خسته کننده، از دفتر یادداشت یک پیر مرد» را نوشت. در 1891 «فراریان ساخالین»، «دوئل» و «زنان» را نوشت و سفری به اروپای غربی کرد. در سال 1892 به ایالت نوگورود رفت تا به قحطی زدگان آن ناحیه کمک کند و سازمانی برای امداد به آنها ایجاد کرد و خودش هم از مسکو به ده «میلخوف» نقل مکان کرد و در دهکده مزبور هم به مبارزه بر علیه بیماری وبا که تازه شایع شده بود پرداخت. آثار معروفش در این سال عبارتست از داستانهای: «اطاق شماره 6»، «ملخ»، «زوجه»،« در تبعید» و «همسایگان».در سال 1893، «داستان مرد ناشناس» و یادداشتهای معروف مسافرت به سیبری را تحت عنوان «جزیره ساخالین» منتشر کرد. دکترها توصیه کردند که به کریمه و یا جنوب فرانسه مسافرت کند و در این سالها و سالهای بعد بود که آثار زیر از زیر قلم استادانه چخوف به در آمد: «خانه با مزانین» نمایشنامه «شاهین دریا» داستان بلند «سه سال» و داستانهای کوتاه «جنایت»، آریادانا و «زن». و در سال 1897 به خرج خود در ده های روسیه از جمله همان دهکده ملیخوف مدرسه بنا کرد. برای راحتی دهقانان آن نواحی رنج بسیار برد و داستان های معروف «زندگی من»، «موژیکها»، «درگاری» و «دریک نقطه محلی» را به رشته تحریر در آورد. در این سال داستانهای «آدم توی جلد»، «یونچ»، «مستأجر»، «شوهر»، «خانم مامانی» را نگاشت و در سال بعد (سال 1899) داستانهای «خانم و سگ ملوسش» و «درراوین» را به رشته تحریر درآورد. همچنین از سال 1891، چخوف کار خود را به عنوان پزشک عمومى در دهکده ملیخووا ، در فاصله 80کیلومترى جنوب مسکو، آغاز کرد. بیماران از 50کیلومترى آنجا، پیاده یا با گارى میآمدند تا پزشک جدید را ببینند. آنها سحرگاه در مقابل مطب به صف میایستادند و در برابر دریافت مراقبت هاى پزشکى معامله پایاپاى میکردند. چخوف جزئیات را ثبت میکرد، به رایگان دارو میداد و ظرف کمتر از 6 ماه ، 576ویزیت خانگى انجام داد. در ماه ژوئیه ، براىکمک به تحت کنترل درآوردن همه گیرى ویرانگر وبا به سمت مأمور سلامت عمومى ناحیه گماشته شد. درکمتر از 2 ماه ، تقریبا 1000 بیمار را ویزیت کرد. با شروع زمستان، همه گیرى وبا پایان یافت اما چخوف کاملا از پاى درآمده بود. روشن نیست که چرا با وجود مرگ برادرش نیکلاس در اثر سل ، او نسبت به حملات بیماری سل بی اهمیت بود. بیمارى او درساخالین بدتر شد اما در بازگشت به مسکو، تا سال 1897از دریافت مراقبت پزشکى امتناع کرد تا زمانیکه بیماری اورا به شدت مورد حمله قرار داد . بنا بر توصیه دکتر آلکسى اوسترومف ، -یکى از اساتید او در دانشکده پزشکى- چخوف براى علاج کامل ، به یالتا و سپس به یک مرکز نگهدارى بیماران مبتلا به سل در دریاى سیاه عزیمت کرد. البته ، او به جاى استراحت ،مشغول برنامه اى براى دریافت اعانه جهت احداث آسایش مسلولین شد. در سال 1900 به عضویت «آکادمی علوم» درپترزبورگ انتخاب شد و نمایشنامه سه خواهر را هم در آن سال تنظیم کرد. در این سال وضع جسمیش روز به روز بدتر می شد در سال 1901 با «اولگاکنیپر» ستاره «تاترهنری» مسکو ازدواج کرد .او همچنین درهمین مدت 3 شاهکار خود را نوشت : «بانوى صاحب سگ»(1899)، «سه خواهر»( 1900)، و «باغ آلبالو» (1903). در ماه مه سال 1904 دیگر قادر نبود که از تخت به زیر آید و به اتفاق زنش به یک آسایشگاه آلمانی در «بادن وایلر» رفت و در همان آسایشگاه در سن 44 سالگی در 14 ماه ژوئن سال 1904 بدرود زندگی گفت و جسدش را به مسکو حمل کردند و آنجا در گورستان کلیسای «نودویشی» دفن کردند. کنستانتین استانیسلاوسکى، رئیس سالن تئاتر معروف هنر مسکو،تصمیم گرفت تا نخستین نمایش باغ آلبالو را در 17ژانویه سال 1907درگرامیداشت 44سالگى چخوف و 25ساله شدن عمر نویسندگى وى به نمایش درآورد. | ||||||
. الف) شرایط شرکت در جشنواره:
1 - آثار نمایشی می بایست در مدت حداکثر 20 دقیقه تنظیم و ارائه گردد.
2 - آثار باید متناسب با اجرا در سالن اصلی تالار هنر و سالن های غیر پلاتویی تنظیم و اجرا گردد.
3 - محدودیتی در پذیرش چند اثر از یک هنرمند نمی باشد.
4 – اثر پیشنهادی نباید پیش از این در هیچ جشنواره ای شرکت کرده باشد.
5 – تکمیل و ارسال تقاضانامه به منزلۀ پذیرش تمامی شرایط مندرج در این فراخوان است.
6 – تصمیم گیری در خصوص موارد پیش بینی نشده بر عهدۀ ستاد برگزاری است.
ب) موضوع های پیشنهادی:
موضوع نمایش جهت شرکت در جشنواره آزاد بوده اما اولویت با سرفصل های پیشنهادی زیر می باشد.
اجتماعی:
1 – مناسبات خانوادگی (والدین، همسر، اقتصاد خانواده، اشتغال، مهارتهای ارتباطی والدین با فرزندان، سالمندان، جوانان و ...)
2 – ارتباطات اجتماعی، همسایه، حقوق شهروندی، صلۀ رحم، ازدواج و ...
3 – معضلات شهری و محله محور (اعتیاد، تکدی گری، مشاغل مزاحم و ...)
اصفهان:
1 – تاریخ، افسانه ها و داستانهای کهن اصفهان
2 – اصفهان آینده
3 – میراث فرهنگی و زاینده رود
4 – اصفهان و دفاع مقدس
شادی و تفریح و ارائه الگوهای سالم تفریحی
ج) مراحل حضور در جشنواره:
1 – تکمیل و ارائه فرم تقاضانامۀ حضور در جشنواره
2 – بازبینی و انتخاب آثار (اجرای بازبینی در سالن اصلی تالار هنر)
3 – نمایشهای راه یافته به جشنواره حداقل 2 اجرای عمومی خواهند داشت که یکی از آنها مورد قضاوت داوران قرار خواهد گرفت.
4 – تمامی نمایشهای راه یافته به جشنواره از 1500000 ریال تا 3000000 ریال کمک هزینه دریافت خواهند نمود.
5 – نمایشهای برگزیدۀ جشنواره با انعقاد قرارداد توسط تالار هنر اجرای عمومی در سال 1389 خواهند داشت.
6 – آثاری که واجد تمامی شرایط حضور در جشنواره نباشند، در صورت تأیید شورای تئاتر تالار هنر امکان حضور در بخش جانبی یا اجرای عمومی در مراکز سازمان را خواهند داشت.
د) جوایز:
در کلیۀ بخشها نفرات نمایشهای برگزیده اعلام و لوح تقدیر، تندیس و سکۀ بهار آزادی اهداء می گردد.
ه) گاه شمار:
1 – آخرین فرصت ارائه فرم تقاضای حضور 31/3/89 می باشد.
2 – بازبینی آثار نیمۀ دوم تیر ماه می باشد که تاریخ دقیق آن متعاقباً اعلام خواهد شد.
3 – اجرای جشنواره نیمۀ اول مرداد ماه 1389 می باشد.
تمامی دوستان تئاتری می توانند برای دریافت فرم ثبت نام به تالار هنر مراجعه فرمایند. نشانی: اصفهان، میدان لاله، جنب فروشگاه رفاه، تالار هنر. تلفن: 4 - 5660881
آدرس اینترنتی: www.esfahanfarhang.ir
دانیال حیدری
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نام نمایشنامه |
نام نویسنده |
نام کارگردان |
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بوم بنفش |
حمیده عمویی |
حمیده عمویی |
مشروط |
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مصائب ایاز عیار |
داریوش مختاری اقدمی |
بهمن پورتقی بالکانلو |
مشروط |
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آژیر چهار گوش |
عبدالحی شماسی |
بهمن پورتقی بالکانلو |
قبول |
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شب آفتابی |
ابوالقاسم مهدوی |
هادی اسفندی |
قبول |
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خورشید مغاک |
شهریار نیریز نقدهی |
شهریار نیریز نقدهی |
مشروط |
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تجربه های اخیر ### |
امیر رضا کوهستانی |
احسان گودرزی |
قبول |
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تجربه های اخیر ### |
امیر رضا کوهستانی |
محمد شجاعی |
قبول |
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یک سبد فحش برای ... |
آرش عباسی |
علیرضا قاسمی |
قبول |
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من قاضی القضات ام ## |
نصرا.. قادری |
اکبر صمدی نیا |
قبول |
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من قاضی القضات ام ## |
نصرا.. قادری |
محمد رضا قنبری |
قبول |
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عاشقانه ها |
مهدی آشوغ |
مهدی آشوغ |
مشروط |
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عروسک کیسه |
محسن ایرانمنش |
محسن ایرانمنش |
مشروط |
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عروس |
حسن حاجت پور |
داوود امیر خانی |
قبول |
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قربانی |
سیروس همتی |
علی فرحناک |
قبول |
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رومنس تاریخ و زمان خاصی نداره |
اتابک انوری |
اتابک انوری |
مشروط |
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تائب |
مسعود اسماعیلی |
یاسر نجفیان رضوی |
مشروط |
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لودرچی |
محمد عسگری |
حسن معینی |
قبول |
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اتوبان سکوت |
شهرام کرمی |
سعید نوروزی |
قبول |
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آپارتمان شماره جنگ |
مصطفی کوشکی |
سعید نوروزی |
مشروط |
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مجلس ترحیم |
مصطفی جعفری |
احسان جانمی |
قبول |
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لندهور |
حسین وحدتی |
حسین وحدتی |
قبول |
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وقتی صدای سوت میاد سرت رو بدزد ### |
مهدی صالحیار |
محمد یوسفی زاده |
قبول |
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مسافران ### |
محمد رحمانیان |
سعید باغبانی |
قبول |
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قبله گم شده |
علیرضا حنیفی |
کیانوش بهروز پور |
قبول |
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زمان بی سایه |
احمد بیگلریان |
نیما بیگلریان |
قبول |
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انتهای آسمان |
مجید کاظم زاده مژدهی |
مجید کاظم زاده مژدهی |
قبول |
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زمان بگذرد |
شکوفه آروین |
محمد پور جعفری |
مشروط |
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درنا در باران |
فرهاد پاک سرشت |
محمد پور جعفری |
قبول |
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باد که می نویسد ### |
آرش عباسی |
غریب منوچهری |
قبول |
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باد که می نویسد ### |
آرش عباسی |
محمد طاهری |
قبول |
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درنگ |
رضا بهشتی آتشگاه |
رضا بهشتی آتشگاه |
مشروط |
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قورباغه |
مهدی نصیری |
علیرضا اسدی |
قبول |
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یوسف می آید |
سعید تشکری |
سعید رجبی |
قبول |
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افسانه للهوا |
روح ا.. نوری - یاسر محمودی |
سید روح ا.. بنی عقیل |
مشروط |
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مویه ی کور |
محمد رضا آریانفر |
محمد رضا مولودی |
مشروط |
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شب بخیر آقای سر گروهبان |
محمد برزویی |
محمد برزویی |
مشروط |
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دیده بانان ابدی |
محمد امین سعدی |
میثم سرآبادانی |
قبول |
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وضعیت همیشه قرمز |
محسن رهنما |
محسن عرب زاده |
قبول |
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مردهای مردم ### |
محسن سراجی |
پژمان شاهوردی |
قبول |
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مردهای مردم ### |
محسن سراجی |
عباس خسروی |
قبول |
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به آسمان نگاه کن |
سید محمد خاتمی |
دانیال حیدری |
قبول |
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شب زیر درخت گردو |
سمیه اطیابی |
هژار نورانی |
قبول |
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رهایی |
امیر حسین روح نیا |
امیر حسین روح نیا - الهه خوشکام |
مشروط |
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سوزانتر از شراره |
احمد صدفی |
احمد صدفی |
مشروط |
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به آخرین کلمات این قصه گوش کن |
کامران شهلایی |
کامران شهلایی |
مشروط |
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خروسخوان دلاشوب |
سید محمد مهدی میرئی |
سید محمد مهدی میرئی |
مشروط |
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تا دریا |
قدرت ا.. فتحی |
حسین اقبالیان |
مشروط |
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چریکه غزال |
حسین اقبالیان |
حسین اقبالیان |
مشروط |
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سوره تماشا |
یدا.. شعبان |
یدا.. شعبان |
قبول |
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پرواز بر فراز ابرهای تاریک ### |
علیرضا کلاهچیان |
حامد اخباری |
قبول |
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آب و اندوه |
نادر ساعی ور |
شهرام احمدی |
قبول |
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پایکوبی در بلندی |
فریدون ولایی |
شهرام احمدی |
قبول |
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موج ما را خواهد برد |
آرش منصوری |
آرش منصوری |
مشروط |
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یک غزل هذا جنون العاشقی |
میلاد اکبر نژاد |
سعید جمشیدی |
مشروط |
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سعید ، دوست سعادت |
احسان رحیمی |
ابوالفتح محمودی |
قبول |
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خمیازه های رنگی |
محسن رهنما |
محسن رهنما |
قبول |
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دیالوگ |
حسن سرچاهی |
حسن سرچاهی |
قبول |
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خط سرخ |
حمیدرضا نعیمی |
احمد حسنوند |
قبول |
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جغد قرمز |
نعمت ا.. اسدی مرام |
نعمت ا.. اسدی مرام |
قبول |
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شبیه پدر |
حسین فدایی حسین |
الیاس صدفی |
مشروط |
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کهکشان باکره |
مهدی امین لاری |
مهدی امین لاری |
قبول |
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کابوسنامه |
مسعود رمضانی |
داریوش کیا |
مشروط |
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اوستا رحیم و عروسک هایش |
علی اصغر خطیب زاده |
علی اصغر خطیب زاده |
قبول |
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شاید شبی شوم و شفاف شیطان |
میلاد اکبر نژاد |
کیارش کوه گیوی |
قبول |
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عقل سرخ یک خاطره |
آزاده کاولی حقیقی |
آزاده کاولی حقیقی |
مشروط |
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گزارش تن |
فریدون ولایی |
کریم علی خواه |
قبول |
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کارنامه بندار بیدخش |
بهرام بیضایی |
کریم علی خواه |
قبول |
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هزار و چندمین شب شهرزاد |
فهیمه سیاحیان |
حامد اسماعیل وند |
مشروط |
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قیامت گم شده ها |
بهزاد آقا جمالی |
حامد اسماعیل وند |
قبول |
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در یک سوم دایره |
سجاد نادریان |
سجاد نادریان |
مشروط |
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ابراهیم آقا و گل های قرآن |
فهیمه سیاحیان |
احسان فاضلی |
مشروط |
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حلیمه |
پویا امیری |
پویا امیری |
مشروط |
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تفنگ های کهنه |
هومن روح تافی |
هومن روح تافی |
قبول |
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می خواستم ببوسمت باران گرفت |
میلاد اکبر نژاد |
محمد حسن زاده |
قبول |
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یک تکه از گفتار گو شده ی ماندانا در گزارش.. |
میلاد اکبر نژاد |
هادی شیبانی |
قبول |
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مونس |
علیرضا منفردی |
علیرضا منفردی |
مشروط |
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پریدن ماهی آزاد با پای کبوتر و بال غزال |
مجید کاظم زاده مژدهی |
محمد رسائلی |
قبول |
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شمیم جان |
علی حسن زاده |
سید رضی محمودی فخرآبادی |
مشروط |
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سایه به سایه |
علی حسن زاده |
سید رضی محمودی فخرآبادی |
قبول |
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نماز آخر وقت |
مهدی دهقان |
مهدی دهقان |
مشروط |
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الفبای فراموش شده |
طاهره ولی پور طاهری |
سهند جعفری زاد - طاهره ولی پور طاهری |
مشروط |
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کبودان و اسفندیار |
آرمان امید |
رضا حسینی |
قبول |
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حقیقت دارد تو را در خواب بوسیدم |
میلاد اکبر نژاد |
علی مجید پور |
قبول |
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دهانی پر از کلاغ |
جمشید خانیان |
ثریا امینیان |
مشروط |
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مجلس شبیه تنهایی |
فرهاد ارشاد |
محمد بابایی |
مشروط |
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ساده در این حوالی |
محمد مهدی شهرتی |
فرزانه آشوری |
مشروط |
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عروس چاه |
بهنام میرزایی |
بهنام میرزایی |
قبول |
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مکاشفه |
مهدی ایوبی |
امیر مسعود بیگدلی |
قبول |
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حریر بر زمینه سرب |
مهدی ایوبی |
مریم طالبی انارکی - عفت آب باریکی |
قبول |
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آخر دنیا |
احمد صدفی |
احمد صدفی |
قبول |
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حرکت خون در رگهای خشکیده ### |
آرش عباسی |
مهدی حبیبی |
مشروط |
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سی مرغ ، سیمرغ |
قطب الدین صادقی |
علی محمد کلاگر |
قبول |
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بیوگرافی حادثه ای که در جمجمه اتفاق افتاد |
سیامک مهاجری |
حسین میرباقری |
قبول |
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جادو گر تهران |
سیامک مهاجری - محمد شریف بیخوف تربتی |
حسین میرباقری |
قبول |
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یک قمقمه تشنگی |
لیلا جعفری سفید خوان |
لیلا جعفری سفید خوان |
قبول |
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جلاد ، ماه ، زن |
حسین احمد خوانی |
مهرزاد فتحعلی پور |
مشروط |
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جدال با خوابی بی انتها |
احسان ناجی |
احسان ناجی |
مشروط |
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پرواز |
احسان شادمانی |
ابراهیم اشرف پور - امین حسین زاده |
مشروط |
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عبدالمای |
عبدالرضا سواعدی |
عبدالرضا سواعدی |
مشروط |
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زخم کهنه قبیله من |
نصر ا.. قادری |
شبنم زیرک قشقایی |
قبول |
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شایدم هابیل |
حسین فرخی |
مهتاب ده باشی |
قبول |
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شله پزان |
امیر دژاکام |
مسلم اسماعیلی |
قبول |
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مردی با چشمان آبی |
خسرو امیری |
غلامعلی رضایی |
قبول |
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کلک و رنگ |
محمد حسن مزارعی |
اصغر سلطانی نژاد |
قبول |
به گزارش سایت ایران تئاتر، در این مراسم هیأت داوران متشکل از فرهاد مهندسپور، محمود رضا رحیمی و افشین خورشید باختری برگزیدگان بخشهای مختلف را به شرح زیر معرفی کردند:
موسیقی:
در بخش موسیقی هیأت داوران هیچ برگزیدهای را معرفی نکردند و تنها با اهداء لوح تقدیر و جایزه نقدی از عبدالرضا غلامی آهنگساز نمایش "سرزمین مادری" قدر دانی شد.
طراحی صحنه:
در این بخش از معصومه بساطی، طراح صحنه نمایش "سرزمین مادری"ر و احسان قاسمی طراح صحنه نمایش "ستاره تارا" با اهداء لوح تقدیر و جایزه نقدی قدردانی شد و هیچ برگزیدهای شایسته دریافت جایزه اول تا سوم معرفی نشد.
بازیگر مرد:
هیأت داوران ضمن اهداء لوح تقدیر و جایزه نقدی به هر یک از بازیگران علی صادقی بازیگر نمایش "ستاره تارا" و علیرضا ضیاء چمنی "استخوانهای تنم صدا میکند تاخ تاخ" از خراسان رضوی، جایزه بازیگر سوم مرد را به طور مشترک به علی نفیسی بازیگر نمایش "فریاد اسب" از کرمان و سعید صادقی بازیگر نمایش "به خاطر خواب من سرباز" از خراسان رضوی اهدا کردند.
در این بخش لوح تقدیر و جایزه بازیگر دوم به رضا افشار بازیگر نمایش "به خاطر خواب من سرباز" تعلق گرفت و سید مهدی صمدی نیز جایزه اول بازیگری را به همراه تندیس جشنواره برای بازی در نمایش "اسماعیل، اسماعیل" از گلستان دریافت کرد.
بازیگر زن:
در بخش برگزیدگان بازیگری زن، هیأت داوران ضمن تقدیر و اهدای جایزه نقدی به هر یک از بازیگران نسرین احمدی بازیگر نمایش "سرزمین مادری"، ندا اسدی بازیگر نمایش "به خاطر خواب من سرباز"، آزاده حیدرزاده بازیگر نمایش "استخوانهای تنم صدا میکند تاخ تاخ" از خراسان شمالی و زهره وادی بازیگر نمایش "استخوانهای تنم صدا میکند تاخ تاخ" از خراسان رضوی جایزه بازیگری دوم زن جشنواره را به ستایش رجایینیا بازیگر نمایش "به خاطر خواب من سرباز" اهدا کردند.
زهرا یوسفی بازیگر نمایش "برکه" از گلستان جایزه بازیگر دوم و لوح تقدیر را دریافت کرد و ندا کوهی بازیگر نمایش "به خاطر خواب من سرباز" هم تندیس جشنواره و جایزه بازیگران اول زن را دریافت کرد.
کارگردان:
هیأت داوران جشنواره منطقهای تئاتر دفاع مقدس ـ شرق کشور در بخش کارگردانی با اهدای لوح و جایزه نقدی از آرش منصوری کارگردان نمایش "سرزمین مادری"، علی محمد رادمنش کارگردان نمایش "فریاد اسب" و محسن مقامی و حسین وکیلی کارگردان نمایش "برکه" قدردانی کرده و جایزه کارگردانی سوم را به "مرتضی ملتجی" کارگردان نمایش "استخوانهای تنم صدا میکند تاخ تاخ" از خراسان رضوی اهدا کردند.
در این بخش "محمدحسین عرب" کارگردان نمایش "اسماعیل، اسماعیل" از گلستان دوم شد و علیرضا اسدی کارگردان نمایش "به خاطر خواب من سرباز" از خراسان رضوی تندیس جشنواره و جایزه کارگردانی اول را دریافت کرد.
نمایشنامهنویسی:
در این بخش علی محمد رادمنش نویسنده نمایشنامه "فریاد اسب" سوم شد، "مهدی نصیری" نویسنده نمایشنامه "به خاطر خواب من سرباز" لوح تقدیر و جایزه دوم جشنواره را دریافت کرد و جایزه اول به جمشید خانیان نویسنده نمایشنامه "اسماعیل، اسماعیل" تعلق گرفت.
گفتنی است گروه نمایش اداره کل حفظ آثارونشرارزشهای دفاع مقدس استان کرمانشاه (شهرستان اسلام آبادغرب ) بکارگردانی ونویسندگی آرش منصوری وبازی آقای حسین قنبری رادوخانم نسرین احمدی باآهنگسازی آقای عبدالرضاغلامی دراین جشنواره حضورداشته اند.
مهلت ارسال متون به دبیرخانه جشنواره تئاترمرصادتا ۲۰ام خرداد ۸۹ تمدید شد
این مطلب راعلیشاه ایوانی سرپرست اداره فرهنگ وارشاداسلامی شهرستان اسلام آبادغرب بیان کرد وافزود
نظربه استقبال شرکت کنندگان وتقاضای هنرمندان مهلت دریافت متون تا۲۰ام خدماه ۸۹ تمدید شده است
نشانی دبیرخانه:
کرمانشاه : اسلام آبادغرب اداره فرهنگ و ارشاداسلامی شهرستان تلفن :۰۸۳۲۵۲۲۲۲۵۰-۵۲۲۷۱۲۰
وهفتصددستگاه مجتمع فرهنگی هنری غدیر ۰۸۳۲۵۲۲۴۱۵۵
تهیه خبر: دانیال حیدری
به گزارش سایت ایران تئاتر، این جشنواره با حضور 18 گروه نمایشی در سه تالار تجربه، غدیر و وحدت شهر کرمانشاه برگزار میشود و مراسم اختتامیه آن 4 خرداد در محوطه طاق بستان برگزار میشود.
در این جشنواره در روز نخست آثاری همچون "ری را" نوشته "سجاد افشاریان" به کارگردانی "حسین رحمتیپور" از آران بیدگل، "ننه سلیمان و فرزندانش" نوشته و کار "محمد برزویی" از فسا، "قناری" نوشته و کار "پژمان شاهوردی" از شازند، "سر به ازای سه نیزه" نوشته "ناصح کامگاری" به کارگردانی "حسین وادی" از دیواندره و "رستگاری در شب دور" نوشته "طلا معتضدی" به کارگردانی "جعفر دردانه" از کنگار اجرا میشود.
در دومین روز این جشنواره نیز نمایشهای "یک لحظه، یک عمر" نوشته "علی زیستی" به کارگردانی "نرگس مردی" از کرمانشاه، "گفتار" نوشته و کار "پژمان بازرگان" از هرسین، "زمانی که بگذرد" نوشته "شکوفه آروین" به کارگردانی "فهیمه سوهانی" از تهران، "سیرک" نوشته "محمد مفیدی" به کارگردانی "سعید نوروزی" از کرمانشاه، "همچون رقص با... " نوشته "فرامرز طالبی" به کارگردانی "عباس طاهرخانی" از تاکستان و "مونس" نوشته و کار "علیرضا منفرد" از نیشابور به صحنه میرود.
در سومین روز جشنواره نیز نمایشهای "اتاق پرو" نوشته "سجاد افشاریان" به کارگردانی "محمدمهدی شریفی" از اقلید، "به آخرین کلمات این قصه گوش کن" نوشته و کار "کامران شهلایی" از کرمانشاه، "روایت بیمار اتاق شماره13" نوشته "ناصر نیکبخت" به کارگردانی "حمیدرضا کردستانی" از سنندج، "در بیداری" نوشته "شهرام کرمی" به کارگردانی "محمد حسنزاده" از تربت حیدریه و "رقص خشت" نوشته "فرامرز صفدری" به کارگردانی "پیام صفدری" از فارسان اجرا میشوند در روز پایانی جشنواره نیز دو نمایش "روزی که هر لب ترانهای است" نوشته و کار "رها جهانشاهی" از تهران و "راز کبوتر" نوشته و کار "هادی امامی مقدم" از مرودشت به صحنه میرود.
همچنین هر شب کارگاه آموزشی با حضور منوچهر اکبرلو در حاشیه جشنواره برگزار میشود.
کار انتخاب آثار این جشنواره را هیأتی مرکب از حمیدرضا نعیمی، شهرام کرمی و منوچهر اکبرلو بر عهده داشتند.